Monday, February 13, 2012

The Greedy Cobra and The King Of Frogs

Story in English -

There lived a King of Frogs, Gangadatta in a big well, which was his home. Unable to bear harassment by his relatives, the king abandoned his kingdom and came out of the well and thought,
Deeply lost in such thoughts, the frog king saw a big cobra entering the burrow of a tree and thought, “We must set an enemy to fight an enemy, set a strong person to crush another strong person. Their end will bring us happiness.”
With this aim in view, he went to the burrow and called the cobra, “Priyadarsana, please come out.”

The cobra, however, was careful. He thought, “Who is this fellow? He does not seem to be one of us. I don’t have any friends outside my circle. I will stay inside and find out who the caller is. He could be a magician or someone seeking my help in killing his enemy.”

Then, the cobra shouted from inside, “Who are you, sir?”
"I am Gangadatta, king of frogs. I have come to seek your help,” said the caller.

“I cannot believe you. Can there be friendship between a blade of dry grass and fire? Haven’t the learned said that he, who is natural prey to the predator never, even in a dream, gets closer to him? I cannot trust your words,” said the cobra.

“O Priyadarsana, what I tell you is true. You are my born enemy. But I have come to you seeking help to avenge my humiliation. The learned have said,

“Who humiliated you,” asked the cobra.
“It is my relatives.”

“Where do you live? Is it a well or a pond or a tank?”
“It is a well with stone walls.”
“But I have no legs. How can I reach the well and kill your enemies?”
“Sir, please don’t say no. I will show you how to enter the well. There is a crevice in the wall that opens into the well. It’s a nice hiding place for you. Come, I will show you,” said Gangadatta, king of frogs.
The cobra then thought, “I have become old. Rarely can I get a frog to eat. This fellow has come to give me a new lease of life. I will go with him and have a daily feast of frogs.”
Addressing the king of frogs, the cobra said, “Let’s go.”
“But there is a condition,” said Gangadatta, “Priyadarsana, I will take you there and show you the place. But you should spare frogs that are close to me. You should eat only those I select as food for you.”

The cobra replied, “You are now my friend. I give you my word. I will eat only those marked by you as my food.”

The cobra then emerged from its burrow and accompanied the king of frogs to the well. The frog king showed him the crevice in the well and his relatives who deserved to be killed. The cobra happily settled in the crevice and finished in course of time all those frogs their king had marked for extermination.
Now, without frogs to eat, the cobra told the king, “I have destroyed all your enemies. Now show me prey for food. It is you who brought me here.”

Gangadatta told him, “You have done your job to help me. Now, it is time for you to leave this place.”
“How can I leave?” protested the cobra. “Someone else will occupy my place. So, I will not go, I will stay here only. You offer me one frog every day from your circle of relatives.”

Repenting for making friends with a natural enemy, Gangadatta thought it was better to offer the cobra one friend a day, remembering the saying that “he who befriends a stronger enemy invites certain death. A wise man does not lose all his wealth to save a paltry sum.”

Accordingly, the king of frogs began offering the cobra a frog a day. But the wicked cobra swallowed all the frogs. One day, it was the turn of Yamunadatta, son of the king of frogs. The king cried bitterly over the loss of his son. His wife then told him that there was no point in crying over the past and that he should immediately leave the place and look for ways to end the menace of the cobra.

As days passed, the cobra finished off the entire tribe of frogs with the exception of king Gangadatta. So, he asked Gangadatta, “Look, my friend, there is now no frog left for me to eat. I am very hungry. Show me where and how can sate my hunger.”

The king replied, “Priyadarsana, don’t worry about food as long as I am your friend. You get me out of this well. I will go and look for wells full of frogs. I will tempt them to come here and you can have your fill.”

The cobra said, “You are like a brother to me, Gangadatta. I can’t kill you. But if you bring me food, you will be as good as my father. I will get you out of this well.” Thus, the king came out and disappeared. The cobra was eagerly waiting for the king to bring him food. When Gangadatta failed to turn up even after a long time, the cobra sought the help of a chameleon.

“My friend, you know Gangadatta very well. Please go to him and tell him that it does not matter if he cannot bring me a frog. Let him come. I cannot live without such a trusted friend.”
The chameleon carried the message of the cobra to the king of frogs and told him, “Your friend Priyadarsana is eagerly looking for you to return.”

Gangadatta told him, “Excuse me sir, who can trust a hungry man. You may please go.”

Moral of the Story - Natural enemies can never be friends. Do not try, to become friend of a greedy person.

Story in Hindi -

एक समय की बात है, मेंढकों का राजा, गंगादत्ता एक बड़े से कुएं में रहता था, जो उसका घेर भी था. अपने घेरवालों से अपमान जनिक बातें सुन केर वो अपना राज्य छोड़ कर, कुएं में रहने लगा.        

जब  मेंढक राज अपने सोच में खोया हुआ था, उसी समय उसने एक बड़े से सांप (कोबरा) को पेड़ के तने में जाते हुए देखा और सोचने लगा, "हमें दुश्मन से लड़ने के लिए दुश्मन का साथ ही लेना चाहिए. ताकतवर आदमी ही ताकतवर से लड़ सकता है. दुश्मन का नास ही मेरे लिए ख़ुशी ला सकता है."

अपने आगे लक्ष्य को देख कर, वो पेड़ के तने के पास गया और कोबरा को बुलाया, "प्रियादर्सना, कृपया बहार आयें".

 कोबरा, सावधान था, उसने सोचा," यह कौन मुझे आवाज़ दे रहा है? यह मेरी जाती के तो नहीं है. और मैं अपनी जाती के बाहर किसीसे दोस्ती नहीं करता. मैं अपने घर के अंदर ही रहता हूँ और पता लगता हूँ की यह बुलाने वाला कौन है. यह कोई जादूगर हो सकता है या कोई जो मेरी मदद चाहता हो अपने दुश्मन को ख़तम करने के लिए".

तब, कोबरा अंदर से ही चिल्ला कर बोला, " तुम कौन हो?"

" मैं गंगादत्ता हूँ, मेंढकों का राजा, आपसे मदद लेने आया हूँ, " उसने जवाब दिया.

"मैं तुम पैर बिस्वास नहीं करता. क्या कभी सुखी घास और आग कर बीच मैं दोस्ती हो सकती है? क्या तुमने सुना नहीं है की, शिकार और शिकारी कभी दोस्त नहीं बन सकते हैं? मैं तुम पर बिस्वास नहीं कर सकता हूँ, " कोबरा बोला.

" हे प्रियादर्सना, जो मैं तुम्हें बोल रहा हूँ वो सत्य है. तुम मेरे जनम से दुश्मन हो. पर मैं तुम्हारे पास मदद ले लिए आया हूँ , अपनी बय्जती का बदला लेने के लिए. किसी ने सच कहा है,

"जब तुम्हारी ज़िन्दगी पर बन आती है
मुसीबत तुम्हें सामने से देखती है
अपने दुश्मन के हिसाब से काम करना बेहतर है
और अपनी ज़िन्दगी और घर बचा सकते हैं."
"तुम्हारी किसने बेज्जती की है, "कोबरा ने पूछा.

 " वो मेरे रिश्तेदार हैं."

" तुम कहाँ रहते हो? वह एक कुयाँ है या तालाब है?"

"वो एक कुयाँ है और पत्थर की दीवारें हैं उसकी."
"पर मेरे पास पैर नहीं हैं. मैं कैसे उस कुएं के पास पहुँच कर तुम्हारे दुश्मन को मार सकता हूँ?'
"आप चिंता मत करिए. मुझे ना मत बोलिए. मैं आपको अंदर जाने का रास्ता दिखूंगा. उस कुएं के दिवार पर एक दरार है. वो बिलकुल सही जगह है आपके छुपने के लिए. आएया, मैं आपको दिखता हूँ, " मेंढक राज ने बोला.

तब कोबरा सोचा, "अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ. बहुत मुश्किल से अब मुझे मेंढक खाने को मिलता है. मुझे इसके साथ जाना चाहिए और प्रतिदिन मेंढक का भोजन करना चाहिए.

फिर मेंढक राज को कोबरा ने कहाँ, "ठीक है, चलो".
"पैर एक शर्त है," गंगादत्त बोला, "प्रियदर्शना, मैं आपको वहां ले जाऊँगा और जगह दिखा दूंगा. पर आपको उन मेंढक को छोड़ देना होगा जो मेरे करीब हैं. केवल उनको ही खाहोगे जिन्हें मैं बोलूँगा."

 कोबरा ने जबाब दिया, " अब तुम मेरे दोस्त हो. मैं तुम्हें अपनी जबान देता हूँ. मैं केवल उन्हें खाऊँगा जिन्हें तुम बोलोगे".

तब कोबरा अपने बिल से निकला और मेंढक राज के पीछे पीछे कुएं तक गया. मेंढक राज उसको कुएं को वोह दरार दिखा दिया जहाँ कोबरा आराम से छुप केर बैठ सकता था. और उन रिश्तेदारों को भी दिखाया, जिन्हें वोह मरना चाहता था.कोबरा उस दरार में छुप कर बैठ गया और समय से पहले उन सारे मेंढक को खा गया, जिन्हें उनके राजा ने बताया था. अब, जब सारे मेंढक खत्तम हो गए, तो कोबरा मेंढक राज को बोला, "मैंने तुम्हारे सारे दुश्मन को खत्तम कर दिया है. अब मुझे नया शिकार दिखायो. तुम्ही मुझे यहाँ लाये हो."

गंगादत्त बोला, "आपने अपना काम करके मुझे मदद किया है. अब, यह समय है की आप इस जगह को छोड़ कर चले जायें." "मैं यहाँ से कैसे जा सकता हूँ?" कोबरा ने इनकार किया. " मेरी जगह में कोई और आ जायेगा. मैं यहीं रहूँगा. तुम मुझे प्रतिदिन एक मेंढक दो भोजन के लिए अपने रिश्तेदारों से."

पछताते हुए की अपने दुश्मन से दोस्ती करके गंगादत्त ने गलत किया, गंगादत्त सोचने लगा की बेहतर यही होगा की प्रतिदिन मैं अपने एक रिश्तेदार को दे दूं.

फिर, मेंढक राज प्रतिदिन एक मेंढक, कोबरा देने लगा. पैर, दुष्ट कोबरा सारे मेंढक को निगल गया. फिर एक दिन, यामुनादात्ता की बारी थी, मेंढक राज के पुत्र की बारी थी. राजा अपने बेटे की मृत्यु पर बहुत रोया. उसकी पत्नी ने उससे कहा की अब रोने का कोई फ़ायदा नहीं है और यह बोला की उसे वोह जगह छोड़ कर चले जाना चाहिए, तभी उस कोबरा के आंतक का अंत हो सकता है.

जैसे दिन गुजरा, कोबरा मेंढक राजके पुरे काबिले का खात्मा कर दिया, अब केवल राजा गंगादत्त बच गया था. इसलिए, वो गंगादत्त से बोला, " देखो दोस्त, अब यहाँ कोई मेंढक नहीं बचा है मेरे खाने के लिए. मुझे बहुत भूक लगी है. मुझे बताओ अब मैं क्या खाऊन जिससे मेरी भूक मिट सके."

राजा बोला, "प्रियदर्शना, आप खाने की चिंता मत करो जब तक मैं आपका दोस्त हूँ. आप मुझे इस कुएं से निकलने में मदद करो. मैं जा कर ऐसा कुयाँ देखता हूँ, जिसमें सारे मेंढक भरे हुए होंगे. मैं उस लोगों को इस कुएं के पास आने के लिए बोलूँगा और फिर तुम अपना पेट भर लेना."

कोबरा बोला, "तुम मेरे भाई जैसे हो, गंगादत्त. मैं तुम्हें मार नहीं सकता. पर अगर तुम मेरे लिए खाना ला सकोगे तो तुम मेरे पिता जैसे बन जायोगे. मैं तुम्हें इस कुएं से निकलने मैं मदद करूंगा." इस तरह राजा उस कुएं से बहार निकल कर गायब हो गया. जब बहुत देर तक गंगादत्त नहीं आया, तो कोबरा एक chameleon से मदद माँगा.

" मेरे दोस्त, तुम गंगादत्त को तो जानते ही हो. कृपया उसके पास जाओ और उसको बोलो अगर वोह मेरे लिए मेंढक नहीं ला सकता है तो कोई बात नहीं, वोह खुद वापस आ जाये. मैं इतने आच्छे दोस्त के बिना नहीं रह सकता हूँ."

chameleon कोबरा का सन्देश ले कर राजा गंगादत्त के पास पहुंचा और बोला, " तुम्हारा दोस्त प्रियदर्शना उम्हरे लौटने का इंतज़ार कर रहा है. "

गंगादत्त बोला, "भूखे आदमी का कौन भरोसा कर सकता है. तुम कृपया यहाँ से जाओ."

कहानी का सन्देश- ऐसे लोगो से दोस्ती मत करो, जो तुमसे केवल अपना मतलब निकल न चाहते हैं."

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